कुछ फिल्में समय के साथ बेहरीन होती हैं, वहीं कुछ तो बस एक कॉकटेल की तरह हो जाती हैं, जो समय के साथ थोड़ी कड़वी और मुश्किल हो जाती हैं। करीब एक दशक बाद, ‘कॉकटेल (2012)’ फिर से सिनेमाघरों में आई है, जिसमें इसके सुरीले गाने और यादगार पात्र दर्शकों को फिर से आकर्षित करते हैं। लेकिन जैसे ही लोग इसका पुनः अवलोकन करते हैं, उनके मन में एक कड़वी याद बनी रहती है।
इस फिल्म में वेरोनिका, दीपिका पादुकोण द्वारा निभाई गई, एक ऐसे आधुनिक महिला की छवि प्रस्तुत करती है जो स्वतंत्र, पार्टी प्रेमी और अपने नियमों पर जीती है। लेकिन कहानी उसे ‘पार्टी गर्ल’ के खांचे में डाल देती है, जो पीती है, संबंध बनाती है, और समाज के नियमों का उल्लंघन करती है। यह फिल्म यह संदेश देती है कि अगर महिलाएं बिंदास हैं, तो वे ‘बुरी लड़कियाँ’ हैं जिनके साथ गलत व्यवहार किया जाने के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं।
वहीं, गौतम (सैफ अली खान) फिल्म में एक ऐसे पुरुष का किरदार निभाते हैं, जो अपने साथी के साथ लगातार धोखा करता है। फिल्म उसकी गलतियों को अनदेखा करती है, जिससे यह संदेश मिलता है कि पुरुषों की गलतियाँ माफ़ हो जाती हैं, जबकि महिलाओं को उनके व्यवहार में बदलाव लाना पड़ता है।
कुल मिलाकर, ‘कॉकटेल’ का पुनः अवलोकन आज के विचारशील दर्शकों के लिए एक कड़वा अनुभव बन गया है। यह फिल्म आधुनिक स्त्रीत्व की जटिलताओं को स्टीरियोटाइप्स की सीमाओं में ही रखती है।