कश्मीर की मूल आबादी में हिंदू ब्राह्मणों की अहमियत रही है। 14वीं सदी में इस्लाम का आगमन हुआ, जिसने सामाजिक संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव किए। मुस्लिम पंडितों की पहचान अब भी उनके पूर्वजों के नामों से जुड़ी हुई है, जिनमें ‘पंडित’, ‘भट’ जैसे उपनाम शामिल हैं।
कई मूर्तिपूजक ब्राह्मणों ने इस्लाम स्वीकार किया लेकिन अपनी सामाजिक पहचान को नहीं छोड़ा। इस पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है, क्योंकि कश्मीर की सांस्कृतिक धरोहर और मुस्लिम समुदाय की पहचान के लिए यह महत्वपूर्ण है।