भारत में जब भी कोई डिजिटल स्टार बच्चों के बीच लोकप्रिय हो जाता है, तो साथ ही शुरू हो जाता है एक बहस — क्या ये कंटेंट उनके लिए सही है? क्या कॉमेडी और एंटरटेनमेंट की आड़ में बच्चे गलत आदतें सीख रहे हैं? इसी बहस की आग में इन दिनों नाम आया है स्टैंड-अप कॉमेडियन समे रैना का, जिन्होंने हाल ही में एक विवादित बयान दिया है:
“अगर 8-10 साल के बच्चे मेरा कंटेंट देख रहे हैं, तो इसमें मेरी नहीं, उनके पेरेंट्स की गलती है।”
विवाद की शुरुआत कहाँ से हुई?
हाल ही में हुए “India’s Got Latent” से जुड़ी एक डिजिटल बातचीत में समे रैना का यह बयान सामने आया, जब उनसे पूछा गया कि क्या वो अपने यूट्यूब या स्टैंड-अप कंटेंट में बच्चों के लिए कोई जिम्मेदारी महसूस करते हैं। इसके जवाब में समे ने स्पष्ट रूप से कहा कि वो अपने वीडियो 18+ ऑडियंस के लिए बनाते हैं, और अगर कोई बच्चा इसे देखता है, तो उसकी ज़िम्मेदारी पेरेंट्स पर है, न कि उन पर।
“भारत में हर कोई सुपरवाइज़र है…”
समे रैना ने कहा, “मैंने कभी नहीं कहा कि मेरा कंटेंट बच्चों के लिए है। फिर भी अगर बच्चे देख रहे हैं, तो आपको (पेरेंट्स को) देखना चाहिए कि आपके घर में क्या चल रहा है। मैं क्रिएटर हूं, बेबीसिटर नहीं।”
उनका यह सीधा और कुछ हद तक टकरावपूर्ण बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। कुछ लोग उनकी साफगोई की तारीफ कर रहे हैं, तो कुछ इसे गैर-जिम्मेदाराना कह रहे हैं।
क्या सच में पेरेंट्स की है पूरी गलती?
यह सवाल अब चर्चा का विषय बन चुका है। डिजिटल युग में जहां बच्चे फोन, टैब और टीवी से चिपके रहते हैं, वहां ये तय करना मुश्किल हो गया है कि वो क्या देख रहे हैं। पेरेंट्स की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के लिए पैरेंटल कंट्रोल सेट करें, लेकिन क्या हर माता-पिता डिजिटल दुनिया को इतना समझते हैं?
वहीं दूसरी ओर, क्रिएटर्स का भी एक सामाजिक दायित्व होता है कि वे ये सुनिश्चित करें कि उनके प्लेटफॉर्म पर साफ चेतावनी हो — किस एज ग्रुप के लिए कंटेंट बनाया गया है।
समे रैना की बात एक हद तक सही है उनका कॉन्टेंट कभी भी बच्चों को ध्यान में रखकर नहीं बना। वे ओपन माइंडेड, मॉडर्न ऑडियंस के लिए कंटेंट तैयार करते हैं। लेकिन यह भी सच है कि भारत में क्रिएटर्स बहुत जल्दी “फैमिली फेस” बन जाते हैं चाहे वो गेमिंग हो, स्टैंड-अप हो या म्यूजिक।
जब बच्चे उन्हें “आइडल” मानने लगते हैं, तो हर मज़ाक और हर लाइन का असर कहीं न कहीं उनकी सोच पर पड़ता हैं
समे रैना का बयान एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है बच्चों की डिजिटल परवरिश अब सिर्फ स्कूल और किताबों की नहीं, बल्कि यूट्यूब और इंस्टाग्राम से भी तय हो रही है। पेरेंट्स को टेक्नोलॉजी के साथ अपडेट रहना होगा, और क्रिएटर्स को भी इतना जागरूक कि वे “डिस्क्लेमर” के आगे जाकर डिजिटल एथिक्स की बात करें।
इस पूरी बहस में कोई एक सही या गलत नहीं है — लेकिन बातचीत की ज़रूरत अब पहले से कहीं ज़्यादा है।