1971 का वर्ष भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण समय रहा। भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश में हवाई हमलों की आशंका के चलते नागरिक सुरक्षा को लेकर कई एहतियात बरती गईं। उस समय देश के कई हिस्सों, खासकर सीमावर्ती और बड़े शहरों में मॉक ड्रिल्स (सुरक्षा अभ्यास) आयोजित किए जाते थे, ताकि आम नागरिकों को हवाई हमलों से बचाव के तरीकों की जानकारी दी जा सके।
सायरन की आवाज और ब्लैकआउट का अभ्यास
जब मॉक ड्रिल होती, तो तेज़ आवाज़ में सायरन बजाया जाता था। यह सायरन हवाई हमले की चेतावनी का संकेत होता। जैसे ही सायरन बजता, पूरे शहर में ब्लैकआउट कर दिया जाता। स्ट्रीट लाइटें बंद कर दी जातीं, घरों की लाइटें बुझा दी जातीं और शहर अंधेरे में डूब जाता।
घर के शीशों को कागज़ से ढकना
लोगों को निर्देश दिया जाता था कि वे अपने घरों की खिड़कियों और दरवाज़ों के शीशों को मोटे कागज या कपड़े से ढक दें, ताकि अंदर से रोशनी बाहर न दिखे। इसका मकसद यह था कि दुश्मन के विमान रात में शहरों की स्थिति न देख सकें।
बाहर होने पर क्या करना होता था?
जो लोग मॉक ड्रिल के दौरान घरों से बाहर होते, उन्हें सायरन सुनते ही तुरंत जमीन पर लेटकर अपने कान बंद कर लेने की हिदायत दी जाती थी। इससे धमाके के असर को कुछ हद तक कम किया जा सकता था।
सुरक्षा जागरूकता और अनुशासन
इन मॉक ड्रिल्स का मकसद सिर्फ बचाव नहीं था, बल्कि लोगों में सुरक्षा को लेकर जागरूकता और अनुशासन की भावना भी पैदा करना था। स्कूलों, ऑफिसों और सार्वजनिक स्थलों पर ऐसे अभ्यास नियमित रूप से कराए जाते थे
1971 का समय आज की पीढ़ी के लिए कल्पना से परे हो सकता है, लेकिन उस दौर में नागरिकों की तैयारी, एकजुटता और साहस का जो उदाहरण देखने को मिला, वह प्रेरणादायक है। ऐसे मॉक ड्रिल्स न सिर्फ सुरक्षा का अभ्यास थे, बल्कि एक मजबूत राष्ट्र की नींव भी।